बङे कमाल का है ‘जी’

-रवि रणवीरा

‘जी करता है कि जान से मार दूं उस रमुआ को. दो टके का दुकान क्या कर लिया मुझे रे कह कर बुलाता है. अरे! मैं बेरोजगार ही सही पर जात में बङा हूँ उससे. बैठने के लिए न पूछो, चाय के लिए न पूछो लेकिन बोली तो तहज़ीब से बोलनी चाहिए. साला, जात ही उसकी ऐसी है कि बोली कभी नहीं बदलेगी’. स्वदेश सिंह की यह झल्लाहट वाली बात अच्छी लगी लेकिन गुस्से में इनकी बात भी तो रमुआ के जैसे ही हो गई और तब मुझे दादी का वह कहावत ‘बोली से मिले पान आ, बोलिये से टूटे नाक – कान’. क्या छोटा और क्या बङा दो बोल ही सही ‘जी’ लगा कर बोलने से ही अच्छा है. इस पर एक बात याद आ गया कि गांव में लोग कहते हैं कि ससुरारी सबको लुभाता है और दामाद सबका अति प्रिय होता है.

 

इसके पीछे भी वही ‘जी’ का राज छिपा है क्योंकि लङका अपने माता-पिता और दीदी को कभी जी लगाकर नहीं बात करता है लेकिन शादी के बाद ससुर तो पापाजी और सास मम्मीजी से ही सम्बोधित करता है और साली – साला को भी जी लगा कर बोलता है. तो फिर भला दामाद को प्यार क्यों न मिले ससुराल में. खैर है कि बीवी को बीवीजी नहीं बोलता है, तभी तो पति – पत्नी के बीच में कभी भी जी जैसा मधुर रिश्ता नहीं हो पाया और न ही पत्नी ही पति को पतिजी कहती हैं . लेकिन वही पर देखिए बीवी की बहन केवल जीजाजी कहकर मती मार लेती हैं. जी नहीं करता है सबको जी लगा कर बोलना लेकिन दिलीतमन्ना रहती है कि सब कोई जी लगा कर ही बोले.

 

पर क्या करें यहां पर तो बिना जी बोले कोई जी लगा कर नहीं बोलेगा क्योंकि बिना पैसे के तो अब दुकानदार तेजपत्ता नहीं दे रहे हैं तो फिर बिना सम्मान दिये मान मिलेगा कैसे. तभी एक कुल्फी वाला ठेले पर लाउडस्पीकर से दोहा बजाते हुए आया कि “वाणी ऐसी बोलिये, मन का आपा खोय , औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होय” स्वदेश जी बोले कि ‘ए बन्द कर इ सब आजकल तो बोली पर गोली चल रहा हैं और दिमाग भी गरमा जा रहा है. एतना गरमी में तो कुल्फी से ही शीतलता मिलेगी बस’. लेकिन जैसे ही देखे कि सिपाही रामसेवक आ रहे बोले ‘का सिपाही जी….. ‘. अचानक सिपाही को जी लगाकर बोले तो लगा कि दोहा वाला कुल्फी असर कर गया है. खैर जो भी लेकिन सिपाही जितना भी वसूली करे या नेता जितना भी भ्रष्टाचारी हो जाये हर कोई तो नेताजी, दरोगा जी ही कहता है, चाहे ऊपर से डंडा क्यों न पङ रहा हो. और पाण्डे जी जितने भी ढोंगी हो न हो लेकिन लोग तो पण्डितजी कहना ही पङेगा नहीं तो श्राप लगेगा. क्योंकि भय से यहां पर प्रित जो हो जाता है. जी केवल रिश्ते में नहीं बल्कि बङे – बङे कम्पनी के लिए फायदेमंद साबित हुआ है. जैसे कि इण्डिया में तो अभी सही ढंग से वाॅइस काॅल नहीं हो पाती है और टेलिकॉम कंपनियों ने 2,3,4 के पीछे ‘जी’ लगाकर करोड़ों की कमाई कर रही है. गांव में तो 2जी का आना सौभाग्य की बात है और 4जी मोबाइल के नाम पर मोबाइल कंपनियां पैसा ऐंठ रही है. यह ‘जी’ का जादू है नहीं तो 2के पीछे जी लगने के बाद इतना बड़ा घोटाला नहीं हुआ होता.