दलितों की पिटाई से उठ रहे संदेहास्पद सवाल

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रवि रणवीरा

 

गरीब मुर्दा और गरीबी मुद्दा मात्र है भारत में. उत्तर प्रदेश और बिहार की राजनीति में जातिवाद की लहर कुछ ज्यादा ही उठती है और वोट के लिए पार्टियां हर तरह के हथकंडे आजमाती है. सबसे ज्यादा देश और दलित – गरीब से प्रेम – परवाह चरम सीमा पर दिखाया जाता है. हमारे देश की राजनीति की ऐसी स्थिति है कि बिना धर्मगत व जातिगत मुद्दे के वोट नहीं मिल सकता.

 

हम जनसाधारण भी आदतन मजबूर हैं और करें तो करें क्या हमें तो जो दिखाया जाता है देखते हैं और जो बोला जाता है सुनते हैं बाकी अंदरुनी बात से बेखबर ही रहते हैं. हम दलित – गरीब  का जो हाल कल था, वह आज भी है. बस बदलाव इतना भर है कि अब हम बोलना सीख गये हैं. झण्डा – डण्डा ढोने और नारेबाजी के लिए हमसे उपयुक्त तो कोई हैं ही नहीं. क्यूँकि हमारे मजबूरी की मजदूरी कल भी सवा सेर थी और आज भी वही है.

 

आजादी के बाद हर पार्टी ने दावा किया कि दलित गरीबों का विकास होगा लेकिन अपने आसपास ही देखिये धोबी आज भी घाट, मोची चौराहे, मजदूर खेत से आगे नहीं बढ़ पाया और बढ़ा भी तो आत्महत्या के लिए. क्या यह विकास हैं? जबकि मौका मिलने पर राजनीतिक दल विकास के नाम पर गरीबों की झुग्गियों को उजाङने से जरा भी नहीं सकोचते. इतना ही नहीं मुआवजा और विस्थापन के नाम पर करते हैं शोषण. क्या यह विकास है? पिछङो को पछाङने का खेल ही तो राजनीति है लेकिन विडंबना यह है कि हम सब कुछ देखते हुए भी वोट बस बेटी की तरह पेटी में डाल कर आ जाते हैं. उससे भी चिंतनीय और शर्मनाक बात तो यह है कि हमारे चुनें हुए प्रतिनिधि ही हंसों के बीच में बगुला बन बैठ जाते हैं.

 

अभी गुजरात के उना में दलितों की पिटाई से मायावती को विपक्षियों पर आरोप लगाने का मौका मिला लेकिन इन्हें दलितों के दर्द पर मरहम लगाने का फुर्सत नहीं है. लेकिन चौकाने वाली बात यह है कि उना दलित उत्पीड़न के बाद देश के लगभग भिन्न – भिन्न जगहों पर एक के बाद एक दलित पिटाई की घटना घटी. और जब तक यूपी विधानसभा चुनाव खत्म नहीं होता पता कितने दलित शिकार होंगे! उना के घटना के बाद बीजेपी को करारा झटका लगा है तो वह अपना दलित वोट क्यूँ कम करना चाहेंगे? यह भी हो सकता है कि उना घटना से दलित नेताओं को मिले सफलता ने दलित ठीकरा बीजेपी के सर पर फोङने को उत्सुक किया हो!सवाल तो बहुत उठ रहे हैं और यह लाजिम है. खैर वास्तविकता जो भी हो लेकिन यह सिध्द हो गया कि हमारे नेता अपने वोट के लिए दलित – गरीब – मजबूर का बखूबी फायदा उठाना जानते हैं.