7 वें वेतनमान से 70% लोगों पर आर्थिक बोझ बढ़ने की उम्मीद

 

-रवि रणवीरा

 

“कोई बेरोजगारी/ तो कोई कल – कारखानों में/ कोई दुकानों में/ तो कोई दवाखानों में/ मर रहा है तङप रहा है/ और जिसके पाॅकेट में पैसा/ वही तो महंगाई का रोना रो रहा है” बिल्कुल सटीक बैठती है मेरी यह पंक्तियाँ भारत के मौजूदा समय पर. अरे! हाँ, जिसका वेतन 5000 है और जिसका 1 लाख सबको महंगाई के मार से परेशान हैं क्योंकि खाने वाला दस कमाने वाला एक तो भला और उम्मीद भी क्या कर सकते हैं.

जिस देश में बेरोजगारी की बाढ़ बारहों महीने लगी रहती है, वह राष्ट्र विकास की गंगा में तैर नहीं सकता. चाहे वेतनमान जितना भी क्यों न बढे. ना गरीबी अभिशाप है और ना ही बेरोजगारी बीमारी. बल्कि ये दोनों भारतीय राजनीति के लिए वरदान साबित हुई है, तभी तो आज तक हमारा भूखा – नंगा – कुपोषित लोकतंत्र टीका हुआ है. इस देश में अगर विकास के लिए काम होता तो बेरोजगारी और गरीबी सुनिश्चित व सुरक्षित वोट का स्त्रोत नहीं बनती.

सेंसस के अनुसार 21% लोग गरीबी रेखा से नीचे जी रहे हैं और बाकी घुमंतू जातियों का तो सही डेटा भी नहीं बना है क्योंकि पेट का आग उनको स्थिर रहने ही नहीं देता. खैर आँकङे तो बनते हैं गरीबों, मजदूरों, बेरोजगारों के लेकिन बस फाइल तक ही सीमित रह जाते हैं. प्रभावी विकास की बातें – वादे तो मुद्दा भर है, धरातल तो बस रेगिस्तान बना हुआ है. ठीक इसी तरह सातवें वेतनमान ने देश की विकास रथ पर फिर लगाम कस दिया गया है. जो कि फिलहाल में दिखाई नहीं दे रहा है लेकिन इसके दूसरे पहलू में झांकने के बाद पता चलता है कि यह तो विकास हित में नहीं हैं. क्योंकि कुशल अर्थशास्त्री डॉ भीमराव अंबेडकर के अनुसार ‘विकास का मतलब समस्त समाज का समान रूप से विकसित होना ही प्रभावी विकास है’ . और दूसरी ओर हाल ही में इस बात की पुष्टि करते हुए 06 जून, 2016 को नई माॅनिटरी पाॅलिसी की घोषणा के दौरान आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन ने कहा कि ‘सातवें वेतनमान के वजह से महंगाई और भी बढ़ सकती है, जिसमें प्रमुख हैं खाद्य पदार्थ, मकान का किराया, शिक्षा शुल्क और यातायात के किराये’. इन सभी चीजों का सीधा प्रभाव आम आदमी पर पङेगा. जिनके पास न तो निश्चित रोजगार है और न ही सरकारी सुविधाओं का लाभ उठा सकते हैं.

वेतनमान के बढ़ने से  यदि देश की आर्थिक स्थिति सुधरनी होती तो आज भी हमारे देश में किसानों को पैसे की तंगी से आत्महत्या करने की जरूरत नहीं होती और न ही इनके बच्चे बामुश्किल मैट्रिक पास कर के विदेश में जा कर मजदूरी करने के लिए विवश होते. आज भी लगभग 70% आबादी ग्रामीण क्षेत्रों से है, जिसमें से लगभग 20-30% एससी /एसटी व 45-50% तक ओबीसी श्रेणी के हैं. उपरोक्त अंकित लोगों का आर्थिक वृद्धि नहीं हो पा रहा है तो फिर सशक्त- खुशहाल भारत का सपना बस 30% लोगों के खुशहाल होने से हो जायेगा! इस वेतनमान से सिर्फ 50 लाख कर्मचारियों को ही फायदा हैं और दुसरा उन 58 लाख पेंशनरों का, जिनको सरकारी सुख सुविधाओं का लाभ मिल रहा है. सरकार ने सैलरी तो बढा दिया लेकिन यह नहीं सोचा कि इतनी बड़ी रकम आयेगी कहां से.

सरकार ने ना जीडीपी रेट बढ़ाने के लिए काम किया और ना ही राजस्व कर्ज को चुकाया बस सातवें वेतनमान का तोहफा दिया ताकि अगले चुनाव में पकङ बनी रहे. और इसे हम कह भी क्या सकते हैं क्योंकि एकतरफ़ा फैसला कभी भी सामाजिक दृष्टिकोण से हितकारी नहीं होता है. इस वेतनमान की वृद्धि से भारत के ऊपर कर्ज का बोझ कम नहीं होगा बल्कि बढने की सम्भावना ज्यादा है क्योंकि कुछ गिने-चुने सरकारी विभाग है जो कि सरकार को मुनाफा देते हैं बाकि सब तो अपने टेबल कुर्सी तक नहीं साफ कर पाते हैं. सरकारी कर्मचारियों के इस रवैये को हमने प्रत्यक्ष रूप से देखा भी है और मीडिया की खबरें तो आये दिन उजागर करती ही है. तो फिर ऐसे कर्मचारियों को वेतन वृद्धि का तोहफा देना नहीं बल्कि गैरजिम्मेदाराना को बढ़ावा देना है. यदि प्राइवेट संस्थानों की तरह इंसेंटिव के आधार पर वेतन दिया जाता तो वाकई में कार्य तीव्रता के साथ कल्याणकारी होते. और शायद देश को आर्थिक व सामाजिक संकट से अधिकांशतः मुक्ति मिल जाती. इसका एक अन्य साइड इफेक्ट यह है कि आर्थिक बोझ को कम करने के लिए टैक्स के रूप में भरपाई उन 70 प्रतिशत मजदूर किसानों को किसी ना किसी रूप में करना है. इन मजदूरों की श्रेणी में सबसे ज्यादा लोग निम्न जाति के हैं और इकाॅनोमिक्स टाइम्स के अनुसार लगभग 4% एससी / एसटी श्रेणी के लोग सरकारी नौकरी में हैं. तो जरा गौर कीजिए कि केवल 4% आबादी के वेतन वृद्धि से क्या बाकी के मजदूरों का आर्थिक तंगी दूर होगा!

‘द हिन्दू’ के एक लेख(2011) के अनुसार 149 उच्च स्तरीय सरकारी विभागों में तो कोई भी निम्न वर्ग का है ही नहीं. यह भी एक संभावित मूल कारण हो सकता है पिछङे वर्ग के पिछङने और वेतनमान के बढ़ने का. यहाँ पर कोई जातिगत बात नहीं हो रही है लेकिन क्या करें यह तो दुर्भाग्यपूर्ण है कि सबसे ज्यादा मजदूर तो निम्न जाति के लोग ही है. ठीक वैसे ही जैसे अंबेडकर कोई दलित नेतृत्वकारी नहीं थे लेकिन आर्थिक – सामाजिक रूप से पिछड़े लोग सबसे ज्यादा दलित थे, जिसके कारण उन्होंने भारत के कल्याणकारी विकास के लिए दलितों का नहीं  बल्कि पिछङो का नेतृत्व किया. परंतु विडंबना यह है कि कोई आज के समय में कल का अंबेडकर नहीं है वरना आज कल्याणकारी अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर आसमान पर पहुंच गई होती. और मजदूरों और किसानों का भी नियोजित भविष्य होता. मनरेगा ने मजदूरों को सहारा दिया लेकिन मनरेगा में कार्य करने वाले मजदूरों को तो पूरी तरह से काम तक नहीं मिल पाता है तो भला मजदूरी भत्ता का बढ़ना बस सुहाना सपना के जैसे है, फिर भी मनरेगा के मजदूर काम कर रहे हैं. बीपीएल कार्डधारक, विधवा और दिव्यांग के लिए भी सरकार 200 – 500 रूपये प्रति माह देती है लेकिन क्या यह राशि उपयुक्त ! इसी समाज के दूसरे ओर 23.6% की वेतन वृद्धि होने के बाद भी नेशनल जाॅइंट काउंसिल ऑफ एक्शन के संयोजक शिवगोपाल मिश्रा सरकारी कर्मचारियों के साथ हङताल पर जाने की बात कह रहे हैं क्योंकि बढती महंगाई के कारण यह वेतन कम है तो फिर जरा सोचिए कि प्राइवेट संस्थानों में 5000 और 10000 में काम करने वाले लोगों कैसे जी रहे हैं, खैर यह जीने के लायक भी है लेकिन उन एक तिहाई लोगों का क्या जो कि आज भी 100 – 200 रूपये के लिए जीतोङ मेहनत करते हैं और वह भी 12 महीने में से केवल 5-6 महीने ही काम कर पाते हैं. इस देश की समस्या यह नहीं है कि लोग मजदूरी क्यों कर रहे हैं बल्कि समस्या तो यह है कि आखिर कब तक यह बङी अबादी रोजगार खोज – खोज, कम पैसे में काम कर गरीबी को दूर करेगी.

सर्वे – रिपोर्ट के आँकङो को भूल कर अगर धरातल पर आ कर निष्पक्षता से देखा जाए तो पता चलेगा कि महँगाई की मार से बचाने की जरूरत किसको है. उनको जिनके पास नियोजित और सुरक्षित भविष्य है, जिनके बच्चे बड़े – बङे शिक्षण संस्थानों में पढ रहे हैं, जो सरकारी सुख सुविधाओं का लाभ उठा रहे हैं या फिर उनको जिनको अगले दिन के रोजगार खोजने के लिए भी मेहनत करनी पड़ती है, जिनके बच्चों के किताब खरीदने के लिए भी कर्ज लेना पड़ जाता है. देश के ऊपर इस वेतनमान का बोझ बढ़ने वाला है और इसी राष्ट्रीय कर्ज को दिखाकर सरकार गरीबों के पेंशन और मजदूरी को ज्यों का त्यों कायम रखने में सफल हो जायेगी, जैसा कि सालों से चला आ रहा है. छोटे को बङा बनाने के लिए बङे को काटना अनुचित है लेकिन केवल उपजाऊ जमीन पर सिंचाई करने से मरूभूमि तो बस पत्थर – सी बनी रहेंगी. और आखिर कब तक हम अपने जीवन को सहज व फैशनेबल बनाने के लिए गरीबी से अधिकृत वसूली करते रहेंगे!