पत्रकारों की हत्या और सरकार का सौतेला व्यवहार

-रवि रणवीरा

दूसरों की समानता व न्याय के लिए आवाज उठाने वाला पत्रकार ही असमानता व अन्याय का शिकार हो रहा है तभी तो पत्रकारों की मौत मच्छरों की तरह होने लगी है और जिसके दिल में खटका मार देता है. हाँ! यह सच है, इसमें बुरा मानने वाली कोई बात नहीं है. यहां पत्रकारों की मच्छर मौत नहीं तो और क्या है क्योंकि व्यापम घोटाले को उजागर करने में जुङे सैकड़ों पत्रकारों को निर्ममता से मार दिया गया. आजतक के सफल खोजी पत्रकार अक्षय की मृत्यु उसका एक जिंदा उदाहरण है. हाल ही में हिन्दुस्तान अखबार के सिवान जिले के ब्यूरो चीफ राजदेव रंजन, झारखंड के चतरा में पत्रकार की हत्या और उसके कुछ ही दिनों बाद द टेलिग्राफ पटना के पत्रकार को बेरहमी से पीटा गया. यह सब तो हाल फिलहाल की घटनाओं का ब्यौरा है और अन्य सालों के रिकॉर्ड को देखने के बाद पता चलता है कि पत्रकारों की हत्या साल दर साल तेजी से बढती जा रही है. हम विडियो गेम में एक सिपाही के मरने के बाद बौखला जाते हैं और होशियार हो जाते हैं. जब एक गेम में मरे सिपाही के लिए इतना हमदर्दी व चिंता है तो फिर देश – समाज के लिए वास्तविक लङाई लङने वाले पत्रकार के लिए क्यों नहीं है? पत्रकार के हिस्से में बस मौत मात्र है. क्या हमारा दायित्व नहीं बनता उनको रक्षा देने का? संविधान के अनुसार भी है और इंसानियत के नाते भी लेकिन करता कौन है, क्योंकि सरकार भी अनदेखा कर रही है तो भला आम आदमी क्या करें. जिस लोकतांत्रिक देश में पत्रकारिता असुरक्षित महसूस कर रही है, उस देश में लोकतंत्र भी खतरे से खाली नहीं है.

लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर सरकार का सौतेला नजरिया-

हर कोई जानता है कि पत्रकारिता लोकतंत्र की चौथी इकाई या स्तंभ है और पत्रकारिता अंग्रेजों के जमाने से ही अपनी सक्रियता से काम कर रही है तो इस हिसाब से यह सबसे पुरानी हुयी. खैर पुराने – नये की बात छोड़ देते हैं और एक नजर डालते हैं कि क्या बाकी तीन स्तंभों की भाँति सरकार की इस पर नजर है! थोङी देर असमंजस में पड़ गए ना क्योंकि उन तीन स्तंभों के समक्ष पत्रकारिता को तो कुछ समझा ही नहीं सरकार ने, तो फिर बस नाम मात्र का है लोकतंत्र का चौथा सबसे पुराना स्तंभ. लोकतंत्र के अन्य तीन स्तंभों के कर्मचारियों को सरकार सुविधाएं मुहैया कराती हैं और यहां तक कि रियायत भी मिलती हैं जबकि पत्रकारिता भूखे – प्यासे समाज के लिए लङकर दम तोड़ रही हैं. और कुछ तो छोङो सुरक्षा के नाम पर भी ठेंगा. ‘सोनेवाला मेवा खाये और लङने वाले गोली’ यह वाक्य बिलकुल सटिक है इस परिस्थिति के लिए. और यह कैसी समानता है कि आज तक पत्रकारिता को समानता का एहसास तक नहीं हुआ. जब पत्रकारिता की यह स्थिति है तो फिर बाकी साधारण को कौन पूछता है. जिस देश में लोकतंत्र का चौथा पैर ही टूटा हो तो फिर वहां पर स्वस्थ समाज की परिकल्पना कैसे की जा सकती हैं. जहाँ पर पत्रकारों की जान असुरक्षित हो वहां पर शांति सौहार्द कैसे हो सकती हैं. जहाँ पर पत्रकारिता ही अन्याय के गिरफ्त में है तो फिर वहां पर न्याय की आशा कैसे की जा सकती हैं. सौतेले के हिस्से में भी कुछ न कुछ मिल जाता है ठीक वैसे ही कुछ पेंशन व अन्य लॉलीपॉप फंड है जो बहुत कम को ही मिलता है क्योंकि उस समय तक पत्रकार का जिंदा रह जाना किसी चमत्कार से कम नहीं. लेकिन पत्रकार हत्या को लेकर सरकार का खामोश हो जाना परमाणु खतरे के जैसा संकेत है.

पत्रकार वाकई में है कौन –

पत्रकार तो बस माध्यम मात्र है किताबों की माने तो. लेकिन सच में पत्रकार किसी योध्दा से कम नहीं है क्योंकि इनके कार्य की कोई समय सीमा नहीं होती है और न ही विशेष सुविधा उपलब्ध होती है इनके लिए. पत्रकार वह है जो बस हमारे दिपावली, होली, ईद को देखकर नये शब्दों से उत्साहित कराता हैं क्योंकि परिवार के साथ त्योहार मनायेगा तो फिर खबर कौन देगा. पत्रकार वह है जो कि अपने सारे रिश्ते को भूल कर बस पाठक प्यार में लगा हुआ रहता है. इतना परित्याग के बाद भी वेतन के नाम पर मिलता है बस गुजारे भर का दो पैसा फिर भी ये कभी हङताल पर नहीं बैठे ताकि आम आदमी को खबर समय पर मिले. मतलब कि यह पत्रकारिता का दूसरा नाम है त्याग, बलिदान व फना. इतना सब जानने के बाद भी हम इन पत्रकारों को देते क्या है, गाली और गोली. जरा सोचिए कि पत्रकारिता नहीं होती तो हम कितने अधूरे होते और न ही हम आजाद होते लेकिन इतना सोचता कौन है क्योंकि हम तो पत्रकार का मतलब जानते हैं बस उसको गाली देना, हाथापाई करना और अंत में बेरहमी से मार देना.

पत्रकार हत्या के संभावित कारण-

आँकङे बताते हैं कि सबसे ज्यादा हत्या राजनीतिक बीट के पत्रकारों की होती हैं और उसके बाद क्राइम बीट के पत्रकारों की. तो इस बात को हम कतई छुपा नहीं सकते हैं कि भ्रष्टाचार राजनीति में व्याप्त है और भ्रष्टाचारी नेता यह नहीं चाहते हैं कि उनकी पोल खुले और जगजाहिर हो. ठीक इसी तरह क्राइम के क्षेत्र में भी होता है क्योंकि क्राइम का ताल्लुक भी राजनीति से जुड़ा हुआ है. यानी कि सरल शब्दों में कहें तो किसी को सच बर्दाश्त नहीं हो रहा है. तथ्य के आधार पर खबर लिखने व लोगों को जागरूक करने वाले पत्रकारों की हत्या तो आम बात बन गई हैं. फिर भी पत्रकार निडरता से कर्तव्यों का पालन कर रहे हैं हालांकि यह भी सच है कि कुछ पत्रकारों ने पत्रकारिता को गंदा कर रखा है लेकिन आज के मौजूदा समय में गाली व गोली उन्हें ही मिलती है जो कि सच बोलने और लिखने का साहस करते हैं. हत्याओं से हार मानने वाले पत्रकार नहीं है लेकिन कब तक आधे पेट खा कर पत्रकार यूं ही बलि का बकरा बनते रहेंगे क्योंकि जीवन को जीने के लिए ख्याति व सच के साथ-साथ अन्य चीजों की जरूरत होती हैं,जो कि बाकी के अन्य लोगों को होती हैं. हत्यारों को सजा आज नहीं तो कल मिल जायेगा लेकिन लोकतंत्र के राज्य में पत्रकारिता आखिर कब तक सरकार के सौतेले व्यवस्था का शोषण होती रहेगी. लेकिन हमारी आस्था तो लोकतंत्र के विधि व्यवस्था पर अब भी है परंतु क्या न्याय मिल पायेगा!