दूसरों का खर्चा खुद का चर्चा शिव के सहारे हरे-भरे

 

-रवि रणवीरा

 

इंसान को भगवान् ने बनाया श्रृष्टि बरकरार रखने के लिए और इंसान ने भगवानों को बनाना शुरू कर दिया खुद को बचाने के लिए तब से ऊपरवाले ने विश्वास कर छोड़ दिया जग को मानव के भरोसे इसीलिए तो धर्म स्थलों पर भी कुकर्म बढने लगा है. भले ही भक्ति का तरीका बदल गया है लेकिन भक्ति की धारा तो बह रही है और बहेगी ही.

 

सत्संग कलयुग में एक ऐसा ठिकाना है, जहां पर सब कुछ आसान लगता है. चाहे भगवान् को पाने की बात हो या भरतप्रेम बढाने की. हाँ, सच में सत्संग तो भगवान् का दर्शन केन्द्र बन गया है और वह भी घोर कलियुग में, बिल्कुल विश्वास नहीं हो रहा है ना लेकिन जब सत्संग में सतबचन सुनेंगे तो आपको विश्वास करना ही पड़ेगा, चाहे आपका दिल माने या न मानें. खैर जो भी हो लेकिन एक बात तो है कि इस व्यस्त जीवन में समय निकालकर सत्संग करना भी किसी उच्च स्तरीय उपलब्धि से कम नहीं है.

 

भगवान् हो या न हो, मिले या न मिले लेकिन इनके नाम पर हम तो मिल रहे हैं. सच कभी बोले या न बोले लेकिन पहली बार सत्संग सुनने इसी आशा में आये थे. आपने पता नहीं दर्शन किया या नहीं किया लेकिन दुसरे को दर्शन का लोभ दिखा कर उसको भी अपने आसन पर बिठाने लगे. पता नहीं आपने सच बोला कि नहीं लेकिन किसी अन्य को उपदेश देने लगे. बिलकुल फिल्मी स्टार कि तरह टीवी पर बङी – बङी बातें और वास्तविक जीवन में समाज के हित में एक छोटा काम नहीं.

 

आज के फिल्मी सितारों में और सत्संगी में कोई फर्क नहीं है क्योंकि दोनों का काम है जन समुदाय को एकजुट कर सम्बोधित करना, जागरूक करना और जब उनकी रियलिटी देखिये तो आसाराम से आशा का छूटना व सलमान से सलामती का टूटना तय है. इतना सबकुछ देखने के बाद भी लोग हैं कि दिमक की तरह लगे हैं लेकिन विडम्बना है कि खुद ही खोखले हो रहे हैं. अगर खोखला नहीं हो रहे हैं तो जरा खुद से पूछे कि महावीर, बुध्द ने कब किस से चंदा लिया था और ज्ञान देने के लिए कौन- सा एयरलाइंस पकङा था. किसी सारथी बाबा से इसका जवाब मत पूछिएगा नहीं तो अपने सच को सच बनाने के लिए निडरता से वह किसी भी एयरलाइंस में बुध्द को सैर करा देगा और आप भी यकीन के साथ यकीन कर लीजिएगा. सबकी छोङ खुद की सुन लिजिये. कुछ याद आया, नहीं ना. तो फिर जाइये एक दस रुपये की नैतिक शिक्षा की किताब लेकर पढ लिजिये ताकि वाकई में सशुध्द आजाद सोच मिल जाये. वर्ना आसाराम, सारथी जैसे लोग तो यूं ही मिल जायेंगे किसी ना किसी जगह आज के भगवान् के रूप में और भुगतान कर के रस पी लिजिये हरि नाम का चाहे वह पानी छुटकी गंगा का ही क्यों न हो.

 

हम इंसान भी तो कमाल के है क्योंकि पत्थरों पर हजारों लुटा देते हैं और खुले आसमान में दिख रहे चांद, सुरज को भाव तक नहीं देते हैं,शायद इसलिए कि हमें तो मोल भाव की आदत है.