भारतीय दर्शन का वेद वेदांत से कोई संबन्ध नहीं है

 

संजय जोठे

आदि शंकर, अरबिंदो घोष, विवेकानन्द और रजनीश…

चारों जो भौकाल मचाकर गए उनमे उनका अपना कुछ नहीं रहा, सब उधार …. बौद्ध धर्म सहित ईसाइयत और पश्चिमी ज्ञान का कॉपी पेस्ट।

शंकर के वेदांत से शुरू करते हैं। शंकर का वेदांत इसलिए भी ज्यादा मकबूल हुआ क्योंकि उसने बौद्ध दर्शन की मूल बात चुराकर उसी के खिलाफ मसाला तैयार किया। इस दार्शनिक व्यभिचार की सफलता ने उन्हें हीरो बना दिया। रामानुज ने इस बात के लिए शंकर को खूब गरियाया है। उन्हें प्रच्छन्न बौद्ध कहा है। इसी तरह रामतीर्थ हुए हैं, रामतीर्थ और विवेकानन्द बुद्ध संस्कृति से कम और जीसस की संस्कृति से ज्यादा प्रभावित थे। रामतीर्थ तो अरबी फ़ारसी और अंग्रेजी वाले आदमी थे संस्कृत तक नहीं आती थी वे सूफियों और मिशनरियों से ज्यादा नजदीक थे। रामतीर्थ एक कवि थे, भयानक रूप से अंतर्मुखी और नाजुक से एकांतजीवि। इसी एकांत निष्ठा ने उनकी बलि ले ली। हिमालय में एक चट्टान से कूदकर उन्होंने आत्महत्या की। वे न रहस्यवाद की अलख जगा सके न समाज निर्माण में ही कुछ कर सके। अध्यात्म के नशे ने उन्हें कहीं का न छोड़ा।

लेकिन विवेकानन्द भाग्यशाली रहे।उन्हें ठीक समय पर अमेरिका यूरोप का सत्संग मिल गया और वे चूँकि अंतर्मुखी भावुक नहीं बल्कि तार्किक थे, उन्होंने इसका पूरा लाभ उठाया। वे शिकागो से ज्ञान हासिल करने के बाद पूरी तरह मिशनरी ही बन गए। ऊपर ऊपर वेदांत की बात जरूर की लेकिन उन्हें पता था कि असल काम मिशनरी ढंग से ही होना है। उन्होंने अपने मिशन का जो नाम रखा और जो काम किया उसमे जमीन आसमान का अंतर है। उन्होंने अपने मिशन को रामकृष्ण मिशन नाम दिया लेकिन काम जीसस की स्टाइल में किया। ये रामकृष्ण मिशन नहीं है, इसे विवेकानन्द मिशन कहना ज्यादा ठीक रहेगा। इसका उनके गुरु रामकृष्ण से कोई संबन्ध नहीं। उनके गुरु ने लोककल्याण, गरीबी हटाओ, महिला पढ़ाओ इत्यादि कोई काम नहीं किया। उनके गुरु भारी रहस्यवादी और अंतर्मुखी आदमी थे। विवेकानन्द प्रचण्ड बौद्धिक और संगठनकर्ता थे। दोनों की दिशा अलग थी।

अमेरिका से जब विवेकानन्द को वास्तविक ज्ञान मिला तब उन्हें समझ में आया कि गरीब, अश्वेत, दलित, हब्शी, नीग्रो और यहाँ तक कि महिलाएं भी इंसान हैं उन्हें सही दिशा और सुविधा दी जाए तो वे भी चमत्कार कर सकते हैं। याद कीजिये खेतड़ी महाराज के निमन्त्रण पर एक नर्तकी से उन्होंने कैसा दुर्व्यवहार किया था। उन्होंने उसे इंसान तक न समझा, उसकी तरफ देखना भी कबूल न किया। यही विवेकानन्द जब अमेरिका यूरोप में गए तो उन्होंने पश्चिमी सभ्यता और ईसाइयत का चमत्कार देखा। वे पहली बार देख पाये कि “पापयोनि स्त्रियां” भी बुद्धिमान हो सकती हैं और समाज को आगे बढ़ा सकती हैं।

इन कुछ बातों ने उस विवेकानंद को जन्म दिया जिसकी आज हम तारीफ़ करते हैं। अगर वे समय पर शिकागो न जा पाते और ध्यान समाधि में ही उलझे रहते तो न वे समाज को कुछ दे पाते न ही मिशनरी धर्म की फोटोकापी स्वरूप इस नए हिन्दू धर्म का अविष्कार कर पाते।

इस बीच अरबिंदो घोष भी हैं जो हीगल की भाषा डार्विन और नीत्शे की थ्योरी को वेदांत में प्रक्षेपित करके सुप्रामेन्टल की थ्योरी बनाकर प्रचार करते रहे। वे भी पश्चिम में पले बढ़े यूरोपीय ढंग के आदमी थे। ग्रीक दर्शन और आधुनिक पश्चिमी दर्शन की सारी श्रेष्ठताओं को वेद वेदांत में ढूंढते रहे और अपनी काव्य प्रतिभा के बल पर भारतीय लेखन का ऐसा अनुवाद किया कि सबको लगने लगा कि पश्चिमी खोज के सारे बीज भारतीय शास्त्रों में मौजूद है। भारतियों को बड़ी तृप्ति मिली, उन्होंने अरबिंदो को सर पर उठा लिया। लेकिन उनकी अप्रोच बहुत बौद्धिक थी सो वे ज्यादा नहीं चल सके। शंकर या विवेकानन्द की तरह पूजनीय नहीं बन सके।

अब इस भूमिका के प्रकाश में आदि शंकर और विवेकानन्द को देखिये। सातवी सदी में आदि शंकर ने बौद्ध धर्म की मूल देशना चुराकर उसका वैदिकीकरण किया और हीरो बन गए। पिछली सदी में विवेकानन्द ने मिशनरी ईसाई धर्म की सेवा और समाज निर्माण की बात को सीखकर लोककल्याणवादि धर्म का मॉडल खड़ा किया और हीरो बन गए। मजे की बात ये कि मूल भारतीय वैदिक धर्म में सेवा और समाज निर्माण का कन्सेप्ट कभी रहा ही नहीं, जो थोडा सा सेवाभाव नजर भी आता है वो आध्यात्मिक नजरिये से पूण्य लाभ करने की तरकीब भर है। वर्ण और जाति को थोपते रहो और गरीबी और शोषण को बनाये रखो, फिर गरीब को दान दो और बदले में मोक्ष का रिजर्वेशन पाओ। इस तरह गरीब की सेवा असल में गरीब के हित के लिए नहीं बल्कि खुद के लिए जन्नत की टिकट बुक कराने का उपाय है। यही भारतीय धर्म की लोकहित और सर्वे भवन्तु सुखिनः की भावना का कुल जमा सार है। आधुनिक काल में लोकतन्त्र और आजादी सहित सेवा और समाज निर्माण की बातों ने जनमानस को प्रभावित किया था, इसमे पुराने धर्म संकट में पड गए। इस खतरे से निपटने के लिए इसी सेवाभाव को विवेकानन्द ने ईसाइयत से यूरोप अमेरिका से सीखा और एक नए भारतीय धर्म का अविष्कार कर डाला।

जैसे शंकर प्रच्छन्न बौद्ध हैं, वैसे विवेकानन्द प्रच्छन्न ईसाई हैं।

गौर से देखिये ये बौद्ध धर्म और ईसाइयत से उन्हीं के हथियार चुराकर लड़ने वाली परम्परा है जो शंकर से विवेकानंद तक बह रही है। यही काम अभी हाल ही में भगवान रजनीश ने बड़ी होशियारी से किया।

रजनीश ने हर पुराने ग्रन्थ में जबरन पश्चिमी विज्ञान, मनोविज्ञान, लोकतन्त्र, आजादी और न जाने क्या क्या ठूंस दिया। जहां जगह न थी वहां भी ठूंस दिया। हर परम्परा के अंधविश्वासी समुदाय को उसके ग्रन्थ की मनमाफिक व्याख्या करके ये झूठा ख्याल पकड़ा दिया कि तुम्हारे ग्रन्थों में भी पश्चिमी मूल्य, विज्ञान, लोकतन्त्र, समता इत्यादि भरा हुआ है। लेकिन रजनीश की चाल उलटी पड़ गयी। लोग इस नई व्याख्या के साथ नहीं गए बल्कि उन्ही पुराने ग्रंथों और भगवानों अवतारों से और ज्यादा चिपक गए। रजनीश की चालबाजी बूमरैंग कर गयी।

फिर रजनीश को भी अमेरिका में असली बुद्धत्व मिला, जब उनका आश्रम और सम्पत्ति पर बुलडोजर चलाये गए। उस दौरान उनकी भक्तमण्डलि की आध्यात्मिक समझ और भाईचारा सब गायब हो गए और वे एक धन्नासेठ के बिगड़े बच्चों की तरह लड़ने लगे। वो लड़ाई आज भी जारी है।

लेकिन रजनीश शंकराचार्य और विवेकानन्द से बहुत बुद्धिमान साबित हुए। शायद वे उन दोनों से ज्यादा जी सके इसलिए उनमे बुद्धि आ गयी। खैर जो भी हो, रजनीश ने अंत में गौतम बुद्ध को चुन लिया और पूरी तरह बौद्ध दर्शन का प्रचार किया। वे प्रच्छन्न बौद्ध नहीं बल्कि जाहिर बौद्ध बनकर खुल्लम खुल्ला बुद्ध के गीत गाने लगे और अपनी जीवन भर की असफलता को सफलता में बदल दिया। इस बदलाव की रूपरेखा बनाने के लिए वे कुछ साल मौन रहे और आत्मचिंतन करके अपनी गलतियों को सुधरा। आत्मचिंतन का नतीजा था – बौद्ध धर्म का स्वीकार। उनकी अंतिम चालीस किताबें झेन बौद्ध धर्म पर हैं। कोई भी देख सकता है।

तो इन बातों का मतलब क्या है?

जिसे आप प्रचलित भारतीय दर्शन या धर्म कहते हैं उसका यहां के वेद वेदांत से कोई संबन्ध नहीं। वो हमेशा से ही वेद विरोधियों की मेहनत से चुराया गया है। वो चोरी चाहे श्रमणों बौद्धों जैनों आजीवकों से की गयी हो या आधुनिक ईसाइयत से की गयी हो।