आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्मवादि वेदांत की मूर्खता को बार बार समझना होगा

 

संजय जोठे

 

आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्मवादि वेदांत की मूर्खता को बार बार समझना होगा। यह भी समझना होगा कि बौद्ध धर्म की मूल देशना को चुराकर उन्होंने थोड़ी देर के लिए वाहवाही लूट ली लेकिन पाखण्ड का ऐसा दलदल निर्मित कर दिया जिसमे से आज तक हम नहीं निकल पाये हैं।

बुद्ध ने कहा था कि कोई आत्मा नहीं कोई परमात्मा नहीं और कोई पुनर्जन्म नहीं है। शरीर सहित स्व या आत्म भी अन्य उपादानों या घटकों के मिलन से बनती है और उन्ही घटकों में बिखर जाती है। फिर इन बिखरे हुए शरीर और मनों के टुकड़े (विचार) हजारों अन्य टुकड़ों में मिल जाते हैं। इन टुकड़ों के विराट समुच्चय में से मुट्ठी भर टुकड़े फिर संगठित होकर एक अगले गर्भ में एक नया शरीर और मन या स्व बनाते हैं। यही अगला जन्म है। लेकिन यह उस पुराने व्यक्ति का पुनर्जन्म नहीं है। ये बहुत गहरी बात है इसे ध्यान से समझना होगा। यही बौद्ध धर्म का केंद्र है।

स्व या व्यक्तित्व को ही आत्मा कहा गया है, उसी को बुद्ध ने नकारा है। न कोई स्वतन्त्र और आत्यंतिक व्यक्तित्व होता है न ही उसकी निरन्तरता होती है।

जैसे एक पेड़ मरता है तो उसके शरीर की खाद पर दुसरे पेड़ पैदा हो जाते हैं या उस पेड़ को खाकर दूसरे जीव जन्म लेते हैं। लेकिन ये उस पेड़ का पुनर्जन्म नहीं है। एक जीवन से दूसरा जीवन आ रहा है लेकिन यह पहले व्यक्तित्व की निरन्तरता नहीं है। दूसरा व्यक्ति और उसका आभासी व्यक्तित्व एकदम नया है। यह पुनर्जन्म नहीं सिर्फ नया जन्म है।

संघातों से उत्तपन्न इस शरीर और मन या स्व की वास्तविकता को गहराई से देख लें तो जीवन, शरीर, मन, घटनाओं और समय से तादात्म्य टूटने लगता है और दुःख का निराकरण होने लगता है।

अब चूँकि कोई स्व या व्यक्तित्व मूल रूप से कही है ही नहीं इसलिए उससे मुक्ति संभव है। आभास से ही मुक्ति संभव है। वास्तविक से कोई मुक्ति संभव ही नहीं। अगर आत्मा अजर अमर और सनातन है तो मुक्ति, मोक्ष या निर्वाण संभव ही नहीं है। अजर अमर को कैसे नष्ट किया जा सकता है?

लेकिन वेदांत ने निर्वाण को प्रचलित मोक्ष या परमात्मा से मिलन के अर्थ में चुरा लिया और अनत्ता के दर्शन को मोह माया के निषेध के दर्शन की तरह रंग दिया। बुद्ध ने अनत्ता या शून्य को परम् मूल्य दिया था। अर्थात स्व या व्यक्तित्व नहीं है – ऐसा जान लेना निर्वाण है। इसी बात को वेदान्तियों ने चुराया और “मैं और मेरे से मुक्ति” को मोक्ष बताया।

अब वेदांत की मूर्खता देखिये। कहते हैं मैं और मेरे से यानि व्यक्तित्व और आत्म भाव से मुक्ति ही मोक्ष है। फिर ये भी कहते हैं कि एक स्वतन्त्र अजर अमर आत्मा भी होती है। अब इन दोनों बातों को ध्यान से देखिये। एक तरफ आत्मभाव से मुक्ति की सलाह दे रहे हैं और दुसरी तरफ इसी आत्म को अजर अमर भी बता रहे हैं इस तरह आत्मभाव को – मैं और मेरे को मजबूत भी कर रहे हैं। अगर आत्म अजर अमर है तो उससे मुक्ति की जरूरत क्यों है? और अजर अमर से छुटकारा क्यों चाहिए? फिर आगे ये भी कहते हैं कि परमात्मा में आत्मा विलीन हो जाती है तो मोक्ष हो जाता है।अब जो चीज किसी दूसरी चीज में विलीन हो सकती है वो अजर अमर कैसे हुई?

वेदांती स्पाइडर मेन अपने ही जाल में उलझ मरा है। इसीलिये इस मुल्क में एक सांस में एक तर्क देते हैं दूसरी सांस में विरोधी तर्क देते हैं। ये अनुलोम विलोम हजारों साल से चल रहा है।

बेहतर हो कि बुद्ध को सीधे सीधे समझ लिया जाए। वेदांत की कन्फ्यूज्ड शिक्षाओं और आत्मा परमात्मा की जगह अब बुद्ध के शून्य और अनत्ता को आ जाना चाहिए। समय परिपक्व हो गया है।