कश्मीर की समस्या को कब समझेंगे हम?

 

By Manjar Alam

 

आजाद भारत की सबसे बड़ी चुनौती छद्म देशभक्ति को देखकर लगता हैं की कश्मीर ही सबसे बड़ी समस्या हैं। कैमरे की नज़र से जलता कश्मीर, रोज अंतर्द्वन्द्व में जीते कश्मीर के लोग,सवाल पूछती बहन अपने भाई के लिए,मां बेटे के लिए,बीवी शौहर के लिए और बेटे बाप के लिए वो मुश्किलात जो हर कश्मीरी के नियति में आजादी के बाद से ही शामिल हैं।

आख़िरकार हम कश्मीर पर खुल कर क्यों नही बात करते हैं। AFSPA पर बात होनी चाहिए,लाखों गुमनाम लोगों का हिसाब तो देना पड़ेगा।
2014 में आई फिल्म ‘हैदर’ 1995 में कश्मीर की उस दर्दनाक हालात को लोगो के समक्ष लाइ थी, जो एक तरफ सीमा पार से आजादी के सपने दिखा कर बेच रहें थे जिससे हर कश्मीरी को आजादी मुमकिन लगता हैं, तो दूसरी ओर कश्मीरियों और सेना के बीच आंतरिक कलह का ऐसा दंश जिससे ऐसा प्रतीत होता सेना का हर कदम कश्मीरियों के बंदिशों के लिए हैं।

1954 से लगातार कश्मीर की  जनता सड़कों पर उतरती रही है। कभी सेना के दमन के खिलाफ सड़क पर उतरकर तो कभी चरमपंथी हमले कर के। राजनीतिक अस्थिरता तो लगातार बनी रहती हैं। बहुत सारे कूटनीति बातचीत के बावजूद समस्या जस के तस बनी रही।
दूध माँगोगे खीर देंगे, कश्मीर माँगोगे तो चीर देंगे’; जैसे नारों से उपजी ‘देशभक्ति’ ऐसे देशभक्तो को लाइन में खड़ा कर कश्मीर का इतिहास पुछ दीजिये तो दायें बाएं देखने लगते हैं। ‘कश्मीर का समस्या क्या हैं? क्या कभी हम सरहद से ऊपर उठकर इस मसले पर सोंच सकेंगे?

कश्मीर के इतिहास पर एक नज़र डाले तो अंग्रेजों द्वारा सिखों की पराजय 1846 में हुई, फिर लाहौर संधि हुई। अंग्रेजों ने महाराजा गुलाब सिंह को कश्मीर का शासक बनया । शुरुआती दिनों से ही  कश्मीर क्षेत्र से गिलगित क्षेत्र को बाहर माना जाता रहा । फिर  महाराजा गुलाब सिंह के सबसे बड़े पौत्र महाराजा हरी सिंह 1925 ई. में गद्दी पर बैठे, जिन्होंने 1947 ई. तक शासन किया।
हरि सिंह ने गवर्नर जनरल लार्ड माउंटबेटन को कश्मीर में संकट के बारे में लिखा, व साथ ही भारत से अधिमिलन की इच्छा प्रकट की। इस इच्छा को माउंटबेटन द्वारा 27 अक्टूबर, 1947 को स्वीकार किया गया। भारत ने नियमों का हवाला देते हुए कहा कश्मीर को भारतीय संघ में अधिमिलन संभव हैं। कश्मीर का भारत में विलयन विधि सम्मत माना गया।

कश्मीर को भारत में विलय करना बेहद चुनौतीपूर्ण   था। पाकिस्तान का पृथीकरन धर्म के आधार पर हुआ और कश्मीर घाटी एवं लद्दाख का इलाका जो मुस्लिम बहुल क्षेत्र था। नितिसंगत और तर्कसंगत कश्मीर पाकिस्तान का हिस्सा हो रहा था। धन्यवाद दीजिये पंडित नेहरू को जिन्होंने किसी भी कीमत पर स्वीकार नही किया। हिन्दू राजा पर आरोप लगा की यहां की हिन्दू राजा अधिकांश जनता से पूछे  बिना (जनमत संग्रह) भारत में विलय की घोषणा कर दिया। तब के सबसे लोकप्रिय नेता शेख़ अब्दुल्ला थे। शेख़ अब्दुल्ला मजहब के आधार पर पाकिस्तान में शामिल होने को लेकर आशंकित थे।लेकिन भारतीय संघ में शामिल होने को लेकर भी उनकी अपनी आशंकाएँ थीं। कश्मीर इस शर्त पर भारतीय संघ में शामिल हुआ कि विदेशी मसलों, सुरक्षा और मुद्रा चलन के अतिरिक्त भारतीय राज्य कश्मीर की स्वायत्तता को बरकरार रखेगा और अन्य सभी मसलों पर निर्णय लेने की शक्ति कश्मीर की सरकार के हाथ में होगी। इसके लिए भारतीय संविधान में विशेष धारा 370 को शामिल किया गया। यह कहा गया कि कश्मीर के आंतरिक मामलों में कश्मीर की सरकार को स्वायत्तता प्रदान की जायेगी। इस तरह से भारतीय संविधान के दायरे के भीतर कश्मीर को एक स्वायत्त राज्य के रूप में शामिल किया गया।
कश्मीर के शामिल होने पर कश्मीरी जनता से जनमत संग्रह का भी वायदा किया गया था, अफसोस की इसे कभी निभाया नहीं जा सका। इसके लिए नेहरू का तर्क यह था कि संयुक्त राष्ट्र द्वारा 1947-48 में पाकिस्तान-समर्थित हमले के बाद यह तय किया गया था कि पाकिस्तान कश्मीर के उत्तर-पश्चिमी हिस्से से अपनी सेनाएँ वापस बुलायेगा और उसके बाद जनमत संग्रह कराया जायेगा। पाकिस्तानी शासकों ने अपना कब्ज़ा छोड़ा नहीं और इसके कारण जनमत संग्रह कराने से भारतीय शासकों ने इनकार कर दिया।  1948 में भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन ने जिस जनमतसंग्रह की सिफ़ारिश की थी उसे ही अब भी कुछ लोग कश्मीरियों की असल राय ज़ाहिर करने का एकमात्र तरीक़ा मानते हैं। उस सिफ़ारिश को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की भी मंज़ूरी भी हासिल हैं।

तब से लगातार हुर्रियत के नेता कॉन्फ्रेन्स करते रहें। आजादी की बात दोहराते रहें। लोग हर दिन जिंदा होते हैं मरने के लिए। औरत कब आधी बेवा हो जायेगी किसी को कोई ख़बर नही। AFSPA कानून का गाज़ किसके सर बीतेगा यह भी नही मालूम। सिर्फ टूटपुजिए राष्ट्रवादी नारों से कश्मीर आजाद हो जाता हैं। लाखों मौत की निशां इन नारों में उड़ जाता हैं। कश्मीर का झंडा लिए अभी कितने मौते बाकी हैं।
इन झूटी शान में न तो ठीक से कश्मीर पंडित की बात हो पाती और न ही हरे जख़्म को भरने में मदद मिलती।

अंत में रिटायर्ड वरिस्ट पुलिस ध्रुव जी की निम्न बात : इन दिनों सोशल मीडिया पर एक सवाल बार-बार टांगा और पूछा जा रहा है – धर्म बड़ा या देश ? ज़ाहिर है, सवाल के पीछे कोई जिज्ञासा नहीं, चिढ़ाने की भावना ही ज्यादा है। ईश्वर ने तो यह क़ायनात बनाई, यह पृथ्वी बनाई, प्रेम बनाया, ममता और मासूमियत बनाई। धर्म और देश तो हम मनुष्यों की रचना है। धर्म बने शैतान को क़ाबू में रखने के लिए, लेकिन कालांतर में धर्म शैतानों के क़ब्ज़े में चला गया। प्रेम, भाईचारे और अमन के संदेश देने वाले धर्मों के नाम पर दुनिया में सबसे ज्यादा क़त्लेआम हुए और आज भी हो रहे हैं। संपत्ति की अवधारणा पैदा होने के बाद हमने पृथ्वी को राज्यों और देशों में बांट दिया। वसुधैव कुटुम्बकम का आदर्श भूल अपनी संपत्ति और संसाधन बढ़ाने की ज़िद में राजाओं, बादशाहों और सरकारों ने दुनिया पर अनगिनत युद्ध थोपे और करोड़ों लोगों की बलि ली। स्थायी न धर्म हैं और न देश। वक़्त के साथ धर्म में भी बदलाव आते हैं और देशों की भौगोलिक सीमाएं भी बदलती रही है। मेरे विचार से यह सवाल ही अब अप्रासंगिक है कि धर्म बड़ा है या देश।

पूछा यह जाना चाहिए कि दोनों में मनुष्यता के लिए ज्यादा ख़तरनाक़ कौन है – धर्म या देश ?